"पंद्रह साल… देखते ही देखते बीत गए।"
जब पहली बार कनाडा आया था, कुछ भी आसान नहीं था। हाथ में पैसे नहीं थे, भाषा मुश्किल थी, मौसम जैसे दुश्मन बन कर आया था। लेकिन हौसले बुलंद थे। कहते थे न – "कठिनाइयाँ चाहे जितनी हों, मकसद साफ हो, तो रास्ते भी झुक जाते हैं।"
धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा। छोटे-मोटे कामों से शुरूआत की, फिर पढ़ाई की, जॉब मिली और ज़िंदगी पटरी पर लौटने लगी। बच्चे भी बड़े हो गए थे। बेटे ने एक दिन कहा –
"मैं इंजीनियर बनना चाहता हूं पापा, और अपनी पढ़ाई अमेरिका में करूंगा।"
मैंने बिना सोचे जवाब दिया –
"जो तेरे मन में आए, वही कर। हमारी तो यही कोशिश है – तुम्हारा भविष्य अच्छा बने।"
मुझे लगा, मैं सबसे खुशनसीब पिता हूं। अपने बच्चों के लिए जो सपना देखा था, वो धीरे-धीरे हकीकत बन रहा था।
फिर एक दिन सब बदल गया।
कनाडा सरकार ने नई नीति लागू की। नए नियम, नए मानक। जिन प्रवासियों की योग्यता इन मानकों पर खरी नहीं उतरती, उन्हें देश छोड़ने का नोटिस मिलेगा।
शुरू में लगा, हम तो सेटल्ड हैं, हमें क्या होगा। फिर एक दिन चिट्ठी आई –
"आपका स्टेटस फिर से मूल्यांकित किया जाएगा। अपनी योग्यता और दस्तावेज़ प्रस्तुत करें।"
हमने काग़ज़ दिए, सलाह ली, वकीलों से मिले, पर सब व्यर्थ। योग्यता नई नीति के अनुसार नहीं थी। हमें कनाडा छोड़ने का आदेश मिला – कम समय में, बिना विकल्प के।
वो रात… जब बेटे को बताया कि अब हमें वापस भारत जाना है, वो मेरी ज़िंदगी की सबसे भारी रात थी। उसकी आँखों में सवाल थे, डर था, और एक अधूरा सपना — जो बस बनने ही वाला था, अब बिखर गया था।
भारत लौट आए।
15 साल पहले जो काम छोड़ा था, उसे दोबारा शुरू करना चाहा। लेकिन बाज़ार अब वैसा नहीं रहा। उम्र अब वैसी नहीं रही। पुराने ग्राहक, पुराने चेहरे, सब गायब थे।
अब क्या?
मैं वही इंसान हूं, उसी देश में, उसी काम को फिर से पकड़ने की कोशिश में, लेकिन वक़्त की मार से कमजोर।
सोचता हूं – "क्या पाया?
ना कनाडा वाला सपना बचा, ना भारत वाला पुराना ठिकाना।
ज़िंदगी वहीं पहुंच गई, जहां से कभी चली थी – बल्कि उससे भी पीछे।

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